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काले कौवा काले, घुघुति माला खा ले...! उत्तराखण्ड में आस्था और लोकपरंपरा का उत्सव, मकर संक्रांति पर घुघुतिया त्यार की धू

  • Awaaz Desk
  • January 14, 2026 10:01 AM
Black crow, black, eat the ghughuti garland! A celebration of faith and folk tradition in Uttarakhand, the ghughuti is celebrated with great fanfare on Makar Sankranti.

अल्मोड़ा। उत्तराखण्ड में आज मकर संक्रांति यानी घुघुतिया त्यार (त्योहार) आस्था और उत्साह के साथ मनाया जा रहा है। इस दौरान जहां मंदिरों में आस्था का सैलाब उमड़ा हुआ है, वहीं कुमाऊं में घुघुतिया त्योहार को लेकर लोगों खासतौर पर बच्चों में खासा उत्साह देखने को मिल रहा है। बता दें कि मकर संक्रांति पर शाम को घुघुत बनाए जाते हैं और अगले दिन बच्चे कौओं को घुघुत खाने के लिए आमंत्रित करते हैं। 
उत्तराखंड में घुघुतिया त्योहार के पीछे स्थानीय कथा प्रचलित है कि कुमाऊं क्षेत्र में राजा कल्याण चंद का शासन था, उनकी कोई संतान नहीं थी। ईश्वर की आराधना करने के बाद उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई, जिसका नाम निर्भय चंद था। जिसे प्यार से रानी घुघुतिया कहकर बुलाती थी। घुघुतिया को रानी ने सुंदर सी मोतियों की माला पहना रखी थी। घुघुतिया जब आंगन में खेलता तो रानी मां उसे खिलाते हुए कौओं से कहती थीं। काले कौवा आरे घुघुति की माला खा ले और घुघुति जोर-जोर से ताली बजाकर खुश होता था। घुघुतिया को खेलने के लिए रानी मां पकवान भी रखती थीं, तो कौवे आकर घुघुति के पास इक्ट्ठा हो जाते, तो वो उन्हें प्यार से पकवान खिलाता था। धीरे-धीरे घुघुति बड़ा होने लगा और कौवों से उसकी दोस्ती हो गई और वह कौवों के साथ खेलता रहता था। राजा कल्याण चंद का मंत्री बड़ा हो दुष्ट था, जब राजा निःसंतान था, तो उसे राज्य पाने की आस थी, लेकिन राजकुमार घुघुतिया के जन्म लेने से उसका सपना टूट गया था, वो मन ही मन में घुघुतिया से शत्रुता रखने लगा और एक दिन मौका पाकर वह राजकुमार घुघुति को उठाकर उसे मारने की नियत से घने जंगल की ओर ले जाने लगा। ऐसा करते हुए कौवों ने उसे देख लिया। सभी कौवे अपने दोस्त घुघुति को बचाने के लिए मंत्री और उसके साथियों पर टूट पड़े। कुछ कौवे घुघुति की कीमती मोतियों की माला लेकर राजमहल में पहुंचकर कांव-कांव करने लगे। तभी राजा और रानी की नजर घुघुति की माला पर पड़ी, जिसे कौवा चोंच में दबाए हुए था, उसके साथी कांव-कांव कर रहे थे। राजा-रानी समझ गए कि घुघुति संकट में है। राजा ने अपने सैनिकों को लेकर जंगल में जाकर घुघुति को बचाया और उस दुष्ट मंत्री को बंदी बनाया और उसे मृत्युदंड दिया। घुघुति की जीवन रक्षा होने और सही सलामत घर लौटने पर नगर की राजा सहित समस्त प्रजा बहुत प्रसन्न हुई तथा राजा के आदेश पर नगर में उत्सव का माहौल बन गया। कौओं के सम्मान में सभी नगरवासियों ने घुघुते सहित तरह-तरह के पकवान बनाकर कौवों के साथ-साथ एक दूसरे को भी खिलाए और गीत संगीत के साथ पूरे वातावरण में हर्षोलासित होकर प्रत्येक वर्ष घुघुतिया त्योहार मनाने लगे। इस घटना का समय और उत्तरायणी का त्योहार एक समय होने के कारण घुघुतिया त्योहार के रूप में मनाया जाने लगा। इस दौरान बच्चे आवाज लगाते हुए बोलते हैं कि काले कौआ काले, घुघुति माला खाले, ले कौआ पूरी मकै दे सूनक छूरी, ले कौवा बड़ा मकै दे सुनक घड़ा, ले कौवा नारंगी मकै दे भल-भल सारंगी, आदि की आवाज लगाकर कौओं को बुलाते हैं।


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