इथेनॉल नीति पर विवादः गडकरी की ईमानदारी सवालों के घेरे में! कार मालिकों की मुसीबत, कंपनियों की मुनाफाखोरी! क्या यही है ‘ग्रीन ईंधन’ का सच?
केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी की इथेनॉल नीति और उनके परिवार की कंपनियों के बढ़ते मुनाफे ने देश में एक नया विवाद खड़ा कर दिया है। गडकरी, जो इथेनॉल-मिश्रित पेट्रोल (E20) को भविष्य का ईंधन बताते हैं, पर आरोप है कि उनकी नीतियां उनके बेटों ‘निखिल और सारंग गडकरी’ द्वारा संचालित कंपनियों को लाभ पहुंचा रही हैं। CIAN Agro Industries & Infrastructure Ltd., जिसके प्रबंध निदेशक निखिल गडकरी हैं, ने जून 2024 में 17 करोड़ रुपये की आय से जून 2025 तक 510 करोड़ रुपये की छलांग लगाई, और इसका मार्केट कैप 100 करोड़ से बढ़कर 2000 करोड़ रुपये हो गया। यह वृद्धि E20 नीति के लागू होने के साथ संदिग्ध रूप से मेल खाती है, जिसने गडकरी के परिवार से जुड़े Purti Group और Manas Agro जैसे इथेनॉल उत्पादन व्यवसायों को लाभ पहुंचाया। गडकरी ने दावा किया कि E20 से भारत का 1.40 लाख करोड़ रुपये का तेल आयात बिल बचा है और किसानों को लाभ हुआ। उन्होंने इसे पेट्रोलियम लॉबी द्वारा फैलाई गई झूठी अफवाह करार देते हुए कहा कि E20 से गाड़ियों को कोई नुकसान नहीं हुआ। हालांकि, ऑटो विशेषज्ञों और जनता ने E20 के कारण पुरानी गाड़ियों में 5-7 प्रतिशत माइलेज की कमी और इंजन के रबर व प्लास्टिक पार्ट्स में टूट-फूट की शिकायतें उठाई हैं। सर्विस सेंटरों ने गैर-E20 अनुकूल वाहनों में गैसकेट और फ्यूल पंप की खराबी की बढ़ती घटनाओं की पुष्टि की। इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका (PIL) दायर की गई, जिसमें दावा किया गया कि E20 पुरानी गाड़ियों के लिए उपयुक्त नहीं है और उपभोक्ताओं को विकल्प नहीं दिया जा रहा। सुप्रीम कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया, लेकिन अटॉर्नी जनरल ने लॉबी के दबाव का हवाला देते हुए नीति का बचाव किया। गडकरी ने पेट्रोल की कीमतों में कमी की बात को टालते हुए कहा कि यह उनके क्षेत्राधिकार में नहीं है, जबकि उपभोक्ता E20 की कम ऊर्जा घनत्व के कारण बढ़ते खर्चों से परेशान हैं। भारतीय मोटर मालिकों के लिए यह नीति न केवल आर्थिक बोझ बन रही है, बल्कि गडकरी की ईमानदारी और आत्मनिर्भरता के दावों पर भी सवाल उठा रही है। सोशल मीडिया पर लोग इसे इथेनॉल घोटाला करार दे रहे हैं, जिसमें आम जनता को नुकसान और गडकरी परिवार को लाभ हो रहा है। यदि सरकार पारदर्शिता और उपभोक्ता विकल्प सुनिश्चित नहीं करती, तो यह विवाद भारत के मोटर मालिकों के बीच असंतोष को और बढ़ा सकता है।