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नेपाल में बाढ़ और मलबे ने मचाई तबाही! तीसरे दिन भी जारी है शवों की तलाश, अबतक 469 की मौत

editor
  • Awaaz Desk
  • August 28, 2026 04:08 AM
Floods and debris wreak havoc in Nepal! Search for bodies continues for the third day; 469 dead so far.

काठमांडू। नेपाल और तिब्बत की सीमा से लगे हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियर टूटने और उसके बाद आई विनाशकारी बाढ़ ने पूरे इलाके को हिलाकर रख दिया है। प्राकृतिक आपदा के तीन दिन बाद भी राहत और बचाव अभियान जारी है और मलबे के ढेर से लगातार शव बरामद किए जा रहे हैं। नेपाल पुलिस के मुताबिक हादसे में मृतकों की संख्या बढ़कर 469 हो गई है, जबकि करीब 1545 लोग अब भी लापता बताए जा रहे हैं। सबसे चिंताजनक बात यह है कि लापता लोगों में भारत, अमेरिका, चीन, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और यूक्रेन समेत करीब 30 देशों के नागरिक शामिल हैं। आपदा प्रभावित इलाकों में राहत और बचाव दल मलबे में जिंदगी तलाश रहे हैं। नेपाल पुलिस के अनुसार अब तक करीब 1600 लोगों को सुरक्षित निकाला जा चुका है। इनमें 796 लोगों को हेलीकॉप्टर और 796 लोगों को जमीनी रास्ते से सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाया गया। चितवन जिले में सबसे अधिक 137 शव बरामद हुए हैं। इसके अलावा रसुवा, नुवाकोट, धादिंग, गोरखा, तनहुं और नवलपरासी जिलों में भी मृतकों के शव मिले हैं। बाढ़ और मलबे के तेज बहाव ने नेपाल के बुनियादी ढांचे को भी भारी नुकसान पहुंचाया है। करीब 35 मोटर पुल और 45 झूला पुल तबाह हो गए हैं, जबकि लगभग 40 किलोमीटर सड़कें क्षतिग्रस्त हुई हैं। कई इलाकों का संपर्क पूरी तरह टूट गया है। त्रिशूली और देवीघाट जैसे पनबिजली प्रोजेक्ट भी बाढ़ की चपेट में आए हैं। संपर्क मार्गों के क्षतिग्रस्त होने से राहत सामग्री पहुंचाने और फंसे लोगों को निकालने में बचाव दलों को मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह ने नुवाकोट जिले के बिदुर नगरपालिका पहुंचकर प्रभावित इलाकों का जायजा लिया और राहत एवं बचाव कार्यों की समीक्षा की। दूसरी ओर चीन के प्रधानमंत्री ली छ्यांग ने भी तिब्बत के ग्यीरोंग क्षेत्र का दौरा किया। यहां चीनी सेना की विशेष टीम राहत और बचाव अभियान में जुटी है।

भारत समेत कई देशों ने मदद को बढ़ाए हाथ
नेपाल की इस भयावह त्रासदी के बीच भारत ने भी राहत अभियान तेज कर दिया है। भारत की ओर से अब तक 47.5 टन राहत सामग्री नेपाल भेजी जा चुकी है। इसमें दवाइयां, खाद्य सामग्री और अन्य जरूरी सामान शामिल हैं। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने काठमांडू और बीजिंग स्थित भारतीय दूतावासों के अधिकारियों के साथ बैठक कर हालात की समीक्षा की है। अब तक 84 भारतीय नागरिकों को सुरक्षित निकाला जा चुका है। इनमें त्रिशूली-1 पनबिजली परियोजना में काम करने वाले 63 मजदूर और तमिलनाडु के 21 लोग शामिल हैं। केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा है कि भारत नेपाल को हर संभव सहायता उपलब्ध कराएगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी नेपाल के नेतृत्व से बात कर राहत सामग्री और आवश्यक सहायता भेजने के निर्देश दिए हैं। नेपाल की त्रासदी के बाद कई देशों ने सहायता का ऐलान किया है। अमेरिका ने प्रभावित लोगों के लिए 5 लाख डॉलर की सहायता देने की घोषणा की है। ब्रिटेन ने 50 लाख पाउंड की मदद और आपातकालीन राहत टीमें भेजने का ऐलान किया है। ब्रिटेन के करीब 33 नागरिकों के लापता होने की भी जानकारी सामने आई है। श्रीलंका ने भी नेपाल को 10 लाख डॉलर की आर्थिक सहायता देने की घोषणा की है।

कैसे आई इतनी बड़ी तबाही?
बताया जा रहा है कि बुधवार को नेपाल-चीन सीमा के पास लांगतांग लिरुंग पर्वत के आसपास ग्लेशियर का एक बड़ा हिस्सा अचानक टूट गया। इसके साथ ही पहाड़ की चट्टानों का हिस्सा भी दरक गया। भारी मात्रा में बर्फ, चट्टान और मलबा तेजी से घाटी की ओर बहने लगा। मलबा पहले ल्हेंदे नदी में जा गिरा, जिससे नदी का प्रवाह कुछ समय के लिए बाधित हो गया। इसके बाद जब यह प्राकृतिक अवरोध टूटा तो पानी और मलबे ने बेहद तेज रफ्तार से भोटेकोशी और त्रिशूली नदी प्रणाली की ओर रुख किया। देखते ही देखते मध्य नेपाल के कई इलाकों में बाढ़ और मलबे ने भारी तबाही मचा दी। शुरुआती तौर पर इस घटना को भूकंप से जोड़कर देखा गया था। हालांकि अमेरिकी भूगर्भ सर्वेक्षण एजेंसी यानी यूएसजीएस की जांच में सामने आया कि जिस हलचल को करीब 4.4 तीव्रता का भूकंप समझा गया था, वह वास्तव में ग्लेशियर टूटने और बड़े पैमाने पर मलबे के खिसकने से पैदा हुई थी। कनाडा की कैलगरी यूनिवर्सिटी के भूविज्ञानी डैन शुगर के मुताबिक सैटेलाइट तस्वीरों के अध्ययन से संकेत मिला कि केवल ग्लेशियर ही नहीं टूटा, बल्कि पहाड़ की चट्टान का भी बड़ा हिस्सा उसके साथ नीचे आया। इसी वजह से मलबे और पानी का बहाव इतना विनाशकारी हो गया।

नई झील ने बढ़ाई एक और खतरे की आशंका
बाढ़ की पहली तबाही के बाद अब एक नई चिंता सामने आ गई है। भोटेकोशी नदी के ऊपरी हिस्से में चोचेन खोला और पुरेपु त्सांगपो नदियों के संगम के पास भारी मलबा जमा होने से एक नई झील बन गई है। चीनी अधिकारियों के अनुसार गुरुवार सुबह तक इस झील में करीब 20 लाख घन मीटर पानी जमा हो चुका था। अनुमान है कि अगले तीन दिनों में इसमें करीब 30 लाख घन मीटर और पानी जमा हो सकता है। ऐसे में यदि मलबे से बना प्राकृतिक बांध अचानक टूटता है तो निचले इलाकों में एक और विनाशकारी बाढ़ आ सकती है। नेपाल के जल विज्ञान विभाग ने नदी किनारे रहने वाले लोगों को सतर्क रहने और सुरक्षित स्थानों पर जाने की अपील की है। प्रशासन संभावित खतरे को देखते हुए लगातार जलस्तर और नई बनी झील की स्थिति पर नजर रख रहा है।

उत्तर प्रदेश में भी हाई अलर्ट, उत्तराखंड में भी बढ़ी ग्लेशियर झीलों की निगरानी
नेपाल में आई तबाही का असर भारत के सीमावर्ती इलाकों में भी महसूस किया जा रहा है। उत्तर प्रदेश के महाराजगंज और कुशीनगर जिलों में हाई अलर्ट जारी किया गया है। प्रशासन गंडक नदी के जलस्तर पर लगातार निगरानी रख रहा है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर 32 सदस्यीय एसडीआरएफ टीम और 22 पीएसी जवानों को नेपाल की मदद के लिए भेजा गया है। वहीं बलिया जिले के रसड़ा कस्बे की उषा देवी और उनके बेटे राहुल के भी हादसे के दौरान लापता होने की खबर है। दोनों उस समय अपनी दुकान पर मौजूद थे। बिहार में भी प्रशासन ने सतर्कता बढ़ा दी है। पानी का बहाव बढ़ने के बाद वाल्मीकिनगर बैराज के सभी 36 गेट खोल दिए गए हैं। सीमावर्ती क्षेत्रों में प्रशासन लोगों को नदी और निचले इलाकों से दूर रहने की सलाह दे रहा है। नेपाल की घटना ने उत्तराखंड के हिमालयी इलाकों में भी चिंता बढ़ा दी है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने प्रदेश की 13 संवेदनशील ग्लेशियर झीलों पर निगरानी और मजबूत करने के निर्देश दिए हैं। प्रशासन को संभावित खतरों की लगातार निगरानी करने और किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए तैयार रहने को कहा गया है।


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