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बिहार शिक्षा जगत में महाक्रांति की तैयारी: सभी 524 प्रखंडों में खुलेंगे हाईटेक मॉडल स्कूल, क्या 'कॉमन स्कूल सिस्टम' का सपना होगा साकार?

editor
  • Tapas Vishwas
  • June 25, 2026 02:06 PM
Gearing up for a major revolution in Bihar's education sector: High-tech model schools to open in all 524 blocks—will the dream of a 'Common School System' finally be realized?

पटना। बिहार की स्कूली शिक्षा व्यवस्था को पूरी तरह बदलने और इसे आधुनिक रंग-रूप देने के लिए राज्य सरकार ने एक बेहद महत्वाकांक्षी योजना तैयार की है। सरकार की योजना सूबे के सभी 524 प्रखंडों में आधुनिक सुख-सुविधाओं से लैस 'मॉडल स्कूल' स्थापित करने की है। इसे महज सरकारी स्कूलों के जीर्णोद्धार के तौर पर नहीं, बल्कि राज्य में 'कॉमन स्कूल सिस्टम' (समान शिक्षा प्रणाली) लागू करने की दिशा में एक ऐतिहासिक और क्रांतिकारी कदम माना जा रहा है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने दावा किया है कि आने वाले एक वर्ष के भीतर इन स्कूलों को इस तरह विकसित किया जाएगा कि समाज का अमीर-गरीब का भेद मिट जाएगा और आम नागरिकों के साथ-साथ जिले के कलेक्टर, विधायक और सांसदों के बच्चे भी इनमें पढ़ना पसंद करेंगे।

भारत में समान शिक्षा यानी 'कॉमन स्कूल सिस्टम' का विचार सबसे पहले 1964-66 में कोठारी आयोग ने रखा था, जिसका मूल उद्देश्य था कि अमीर और गरीब का बच्चा एक ही छत के नीचे पड़ोस के स्कूल में पढ़े। बिहार में साल 2006 में पूर्व विदेश सचिव मुचकुंद दुबे की अध्यक्षता में एक आयोग का गठन हुआ था, जिसने जून 2007 में सरकार को नौ साल का एक ठोस रोडमैप सौंपा था। हालांकि, वह रिपोर्ट सालों तक ठंडे बस्ते में धूल फांकती रही। अब 524 प्रखंडों में मॉडल स्कूल खोलने के इस फैसले को मुचकुंद दुबे आयोग की सिफारिशों को पुनर्जीवित करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। बिहार सरकार शिक्षा पर भारी-भरकम राशि खर्च कर रही है। वित्तीय वर्ष 2026-27 के बजट में सरकार ने शिक्षा क्षेत्र के लिए कुल 68,216 करोड़ रुपये का भारी-भरकम प्रावधान किया है। इसमें स्कूली शिक्षा विभाग को 60,204 करोड़ और उच्च शिक्षा को 8,012 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं। इसके बावजूद राज्य के भीतर एक कड़वी हकीकत यह भी है कि बेहतर पढ़ाई की तलाश में छात्रों का पलायन नहीं रुक रहा है। श्रम संसाधन विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2025 में करीब 57 लाख लोग शिक्षा के लिए बिहार से बाहर गए, जिनमें 5 लाख छात्र केवल उच्च शिक्षा के लिए गए। इसके अलावा, निजी स्कूलों की मनमानी फीस और किताबों के नाम पर होने वाली लूट सरकार के लिए बड़ी चुनौती है। माना जा रहा है कि सरकारी मॉडल स्कूल निजी क्षेत्र के लिए एक मजबूत और प्रतिस्पर्धी विकल्प बनेंगे। सरकार के ब्लूप्रिंट के अनुसार, इन मॉडल स्कूलों में अत्याधुनिक स्मार्ट क्लास, विश्वस्तरीय विज्ञान प्रयोगशालाएं, समृद्ध पुस्तकालय, खेल के मैदान और पूरी तरह से अंग्रेजी माध्यम में पढ़ाई की व्यवस्था होगी। जरूरत के अनुसार यहाँ छात्र-छात्राओं के लिए छात्रावास (हॉस्टल) की सुविधा भी दी जाएगी। विशेषज्ञों और शिक्षाविदों के अनुमान के मुताबिक, एक मॉडल स्कूल की आधारभूत संरचना तैयार करने में औसतन 15 से 20 करोड़ रुपये का खर्च आएगा। इस लिहाज से पूरे राज्य में इस योजना को जमीन पर उतारने के लिए करीब 15 से 20 हजार करोड़ रुपये के भारी बजट की आवश्यकता होगी, जिसमें भूमि अधिग्रहण के लिए करीब 10 से 11 हजार करोड़ और इन्फ्रास्ट्रक्चर के लिए 5 हजार करोड़ रुपये शामिल हैं। शिक्षा विशेषज्ञों ने मांग उठाई है कि इन हाईटेक मॉडल स्कूलों में पठन-पाठन का स्तर ऊंचा रखने के लिए शिक्षकों की योग्यता स्नातकोत्तर होनी चाहिए और इनकी बहाली सीधे बिहार लोक सेवा आयोग के माध्यम से पारदर्शी तरीके से कराई जानी चाहिए। साथ ही, इन स्कूलों में बच्चों का दाखिला भी एक निष्पक्ष प्रवेश परीक्षा के आधार पर हो, ताकि मेधावी छात्रों को आगे बढ़ने का सही मौका मिल सके। यदि सरकार इस योजना को केवल कागजी घोषणाओं और चमकदार भवनों तक सीमित रखने के बजाय धरातल पर पूरी कड़ाई, जवाबदेही और योग्य शिक्षकों के साथ लागू करती है, तो निश्चित रूप से बिहार की बदहाल शिक्षा व्यवस्था की तस्वीर बदल जाएगी। अब देखना यह है कि यह योजना वास्तव में कॉमन स्कूल सिस्टम की मजबूत नींव बनती है या सिर्फ एक और सरकारी प्रोजेक्ट बनकर रह जाती है


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