उत्तर भारत के सबसे बड़े बांध प्रोजेक्ट को हरी झंडी: किसाऊ परियोजना पर केंद्र की मुहर, 6 राज्यों में खत्म हुआ सालों का गतिरोध
देहरादून। ऊर्जा और सिंचाई के क्षेत्र में उत्तराखंड समेत पूरे उत्तर भारत के लिए एक ऐतिहासिक और बेहद राहत भरी खबर सामने आई है। पिछले कई दशकों से फाइलों में दबी और अंतरराज्यीय विवादों में उलझी किसाऊ बहुउद्देशीय बांध परियोजना को आखिरकार केंद्र सरकार के प्रयासों से नई जिंदगी मिल गई है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में हुई एक उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक में इस महापरियोजना को लेकर सालों से चला आ रहा गतिरोध पूरी तरह खत्म हो गया है।
केंद्र सरकार की इस विशेष पहल पर उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, हरियाणा और राजस्थान के बीच पानी के बंटवारे और लागत को लेकर पूर्ण सहमति बन गई है। छह राज्यों की इस रजामंदी के बाद अब इस महत्वाकांक्षी परियोजना को धरातल पर उतारने का रास्ता पूरी तरह साफ हो गया है। करीब 15 हजार करोड़ रुपये की अनुमानित लागत वाली यह परियोजना रणनीतिक और आर्थिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। यह बांध उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश की सीमा पर बहने वाली टोंस नदी पर प्रस्तावित है, जो यमुना नदी की सबसे बड़ी सहायक नदी है। सालों से लागत के बंटवारे, बिजली उत्पादन के अधिकार और पानी के वितरण को लेकर राज्यों के बीच आपसी सहमति नहीं बन पा रही थी। अब केंद्र के हस्तक्षेप के बाद सभी छह राज्य जल्द ही एक आधिकारिक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर करेंगे। इसके तुरंत बाद इस प्रोजेक्ट को अंतिम वित्तीय मंजूरी के लिए केंद्रीय मंत्रिमंडल के समक्ष पेश किया जाएगा। लगातार बढ़ती बिजली संकट और ऊर्जा की मांग के बीच किसाऊ परियोजना उत्तराखंड के लिए एक बड़ा वरदान साबित होने वाली है। इस परियोजना के तहत 422 मेगावाट जलविद्युत उत्पादन की क्षमता विकसित की जाएगी, जिससे उत्तराखंड को अपने हिस्से की भारी-भरकम बिजली मिलेगी। इस परियोजना से न केवल राज्य की घरेलू और औद्योगिक ऊर्जा जरूरतें पूरी होंगी, बल्कि अतिरिक्त बिजली बेचकर राज्य सरकार को करोड़ों रुपये का अतिरिक्त राजस्व भी प्राप्त होगा। बिजली के अलावा इस परियोजना का दूसरा सबसे बड़ा फायदा जल प्रबंधन और कृषि क्षेत्र को मिलेगा। बांध के निर्माण से यमुना बेसिन में जल भंडारण की क्षमता कई गुना बढ़ जाएगी। इसका सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि सर्दियों या सूखे के दिनों में, जब नदियों में पानी का प्रवाह बेहद कम हो जाता है, तब भी उत्तराखंड और अन्य राज्यों को सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी मिलता रहेगा। इससे न केवल कृषि क्षेत्र को नई रफ्तार मिलेगी, बल्कि भविष्य की पेयजल आवश्यकताओं को भी आसानी से पूरा किया जा सकेगा। इस उच्चस्तरीय बैठक में परियोजना की फंडिंग को लेकर भी एक बेहद महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसला लिया गया है, जिसने उत्तराखंड और हिमाचल जैसे पहाड़ी राज्यों की बड़ी चिंता दूर कर दी है। तय किया गया है कि इस परियोजना के जल घटक की कुल लागत का 90 प्रतिशत हिस्सा केंद्र सरकार केंद्रीय सहायता के रूप में खुद वहन करेगी। शेष केवल 10 प्रतिशत राशि को ही सभी संबंधित राज्यों के बीच साझा किया जाएगा। इस फैसले से राज्यों पर पड़ने वाला वित्तीय बोझ न के बराबर हो जाएगा। किसाऊ बांध परियोजना का एक बड़ा पर्यावरणीय पहलू भी है। बांध के जरिए टोंस और यमुना नदी में पानी का प्रवाह नियंत्रित और स्वच्छ रहेगा। इससे निचले मैदानी इलाकों में यमुना नदी का पर्यावरणीय प्रवाह बढ़ेगा, जिससे नदी के प्रदूषण स्तर में कमी आएगी और जल की गुणवत्ता में सुधार होगा। इसका सीधा लाभ दिल्ली और उत्तर प्रदेश समेत निचले क्षेत्रों में रहने वाले करोड़ों नागरिकों को मिलेगा। उत्तराखंड सरकार ने इस फैसले का स्वागत करते हुए इसे राज्य के विकास के लिए मील का पत्थर बताया है।