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उत्तराखंड में बिना हिसाब-किताब के दौड़ रही निगमों के माननीयों की गाड़ी, प्रदेश में 25 साल बाद भी यूपी का अधिनियम लागू

editor
  • Tapas Vishwas
  • March 25, 2026 08:03 AM
In Uttarakhand, vehicles belonging to dignitaries of various corporations are operating without proper accountability; even after 25 years, the Uttar Pradesh Act remains in force in the state.

देहरादून। उत्तराखंड के नगर निगमों में जनप्रतिनिधियों के खर्च को लेकर चौंकाने वाली स्थिति सामने आई है। राज्य गठन के 25 वर्ष बाद भी नगर निगमों में उत्तर प्रदेश नगर निगम अधिनियम 1959 के तहत ही व्यवस्थाएं संचालित हो रही हैं, जबकि मेयर और अन्य माननीयों के खर्च की कोई स्पष्ट सीमा तय नहीं है। आरटीआई के जरिए सामने आए इस मामले में खुलासा हुआ है कि निगमों में मेयर और अन्य जनप्रतिनिधियों द्वारा उपयोग की जा रही सरकारी गाड़ियों, ईंधन खर्च और अन्य सुविधाओं के लिए कोई स्पष्ट शासनादेश मौजूद नहीं है। यानी यह खर्च बिना तय सीमा के ही किया जा रहा है। यह मामला तब सामने आया जब रुड़की निवासी अमित अग्रवाल ने फरवरी 2023 में नगर निगम से मेयर के खर्च की सीमा को लेकर जानकारी मांगी। विभाग की ओर से स्पष्ट जवाब न मिलने पर मामला सूचना आयोग तक पहुंच गया। उत्तराखंड सूचना आयोग ने 14 नवंबर 2023 को सुनवाई करते हुए शहरी विकास विभाग को निर्देश दिए कि मेयर और उप मेयर के भत्तों व सुविधाओं को लेकर स्पष्ट व्यवस्था बनाई जाए।

आयोग के निर्देश के बाद शहरी विकास निदेशालय ने प्रस्ताव तैयार कर शासन को भेजा, लेकिन हैरानी की बात यह है कि तीन साल बीतने के बाद भी इस पर कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया। हाल ही में फरवरी 2026 में अपीलकर्ता को भेजे गए जवाब में अपर सचिव ने बताया कि प्रस्ताव पर अभी कार्यवाही “गतिमान” है। आयोग ने इस पूरे मामले को गंभीर बताते हुए टिप्पणी की है कि राज्य में नगर निगमों की संख्या लगातार बढ़ रही है, लेकिन मेयर और उप मेयर के खर्च को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देशों का अभाव है। इससे न केवल पारदर्शिता प्रभावित हो रही है, बल्कि जवाबदेही भी तय नहीं हो पा रही है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, वर्ष 2022-23 के दौरान करीब 15 महीनों में केवल वाहन ईंधन, मरम्मत और कर्मचारियों के वेतन पर ही लगभग 25 लाख रुपये खर्च किए गए। हालांकि, इन खर्चों की कोई निर्धारित सीमा या स्पष्ट नीति नहीं है। इस मुद्दे ने शासन-प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए जल्द से जल्द स्पष्ट नियम बनाए जाने जरूरी हैं, ताकि सरकारी संसाधनों के उपयोग पर नियंत्रण रखा जा सके।
 


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