पंतनगरः मानवता पर सिस्टम भारी! पेंशन के लिए दर-दर भटकने को मजबूर सेवानिवृत्त प्रवक्ता डॉ. राधा वाल्मीकि, एक साल बाद भी नहीं मिला हक
पंतनगर। 31 मार्च 2025 को पंतनगर इंटर कॉलेज से प्रवक्ता (इतिहास) पद से सेवानिवृत्त हो चुकीं डॉ. राधा वाल्मीकि आज भी अपनी पेंशन और अन्य सेवानिवृत्ति देयकों के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने को मजबूर हैं। सेवानिवृत्ति को लगभग एक वर्ष बीत जाने के बावजूद शिक्षा विभाग न तो उनकी पेंशन लागू कर पाया है और न ही किसी भी प्रकार का भुगतान किया गया है। डॉ. राधा वाल्मीकि का आरोप है कि विद्यालय प्रशासन और मुख्य शिक्षा अधिकारी कार्यालय द्वारा उनकी सेवा पुस्तिका और पेंशन से जुड़े दस्तावेजों में जानबूझकर गड़बड़ियां छोड़ी जाती हैं। कभी प्रपत्र गायब कर दिए जाते हैं, तो कभी नई-नई आपत्तियां लगाकर फाइल को एक विभाग से दूसरे विभाग में घुमाया जाता है। नतीजा यह कि फाइल महीनों तक अलमारियों में बंद पड़ी रहती है और पीड़िता को सिर्फ एक ही जवाब मिलता है, आप संबंधित विभाग में जाकर मिल लीजिए।
सीएम पोर्टल पर शिकायत, फिर भी राहत नहीं
लगातार उपेक्षा से विवश होकर डॉ. राधा वाल्मीकि ने 21 जनवरी 2026 को मुख्यमंत्री पोर्टल उत्तराखंड पर शिकायत दर्ज कराई। शिकायत के अगले ही दिन, 22 जनवरी को विद्यालय कार्यालय ने आनन-फानन में पत्रावली मुख्य शिक्षा अधिकारी कार्यालय भेज दी। लेकिन पेंशन की उम्मीद लगाए बैठी डॉ. वाल्मीकि को तब बड़ा झटका लगा, जब 4 फरवरी 2026 को उन्होंने सीएम पोर्टल पर कार्रवाई की स्थिति जाननी चाही। इसके जवाब में 5 फरवरी को मुख्य शिक्षा अधिकारी द्वारा भ्रामक तथ्यों के आधार पर प्रकरण को ‘दीर्घकालीन’ बताते हुए स्पेशल क्लोज करने की सिफारिश कर दी गई। डॉ. राधा वाल्मीकि का कहना है कि मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि मेरे साथ जातिगत दुर्भावना के तहत जानबूझकर यह सब किया जा रहा है। वर्ष 2023 और 2024 में सेवानिवृत्त हुए अन्य शिक्षक-शिक्षिकाओं को चार से छह माह के भीतर ही सभी देयकों और पेंशन का भुगतान कर दिया गया, जबकि मुझे लगातार टालने का प्रयास किया जा रहा है।
पहले भी झेल चुकी हैं विभागीय उत्पीड़न
डॉ. राधा वाल्मीकि के मुताबिक यह पहला मौका नहीं है जब उन्हें शिक्षा विभाग की उपेक्षा का सामना करना पड़ा हो। वर्ष 2019 में पदोन्नति के मामले में भी उन्हें इसी तरह परेशान किया गया, जिसके चलते वे 72 घंटे के आमरण अनशन पर बैठने को विवश हुई थीं। जनसमर्थन और दबाव के बाद ही तब उन्हें पदोन्नति मिल पाई थी। डॉ. वाल्मीकि कहती हैं कि अब वही स्थिति दोबारा मेरे साथ दोहराई जा रही है। मुझे मानसिक और आर्थिक रूप से तोड़ा जा रहा है। यह मेरे जीने के अधिकार का हनन है। डॉ. राधा वाल्मीकि का कहना है कि वह ग्लूकोमा जैसी गंभीर आंखों की बीमारी से पीड़ित हैं। उनकी आंखों की दो बार सर्जरी हो चुकी है, देखने में अत्यधिक दिक्कत होती है और चलना-फिरना भी आसान नहीं है। हर महीने 15 से 20 हजार रुपये सिर्फ दवाइयों और चंडीगढ़ पीजीआई में इलाज पर खर्च हो जाते हैं। ऐसे में बार-बार पंतनगर, रुद्रपुर और हल्द्वानी के चक्कर लगाना मेरे लिए संभव नहीं है। अब बड़ा सवाल यही है कि क्या डॉ. राधा वाल्मीकि को उनका हक समय रहते मिलेगा, या उन्हें फिर से सड़कों पर उतरने को मजबूर किया जाएगा?