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'पुलिस PM-CM की नौकर नहीं है'... बॉम्बे हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी, कहा- सरकार का विरोध अपराध नहीं, लोकतंत्र में असहमति जताना हर नागरिक का अधिकार

editor
  • Awaaz Desk
  • July 03, 2026 01:07 PM
'The police are not servants of the PM or CM' — Bombay High Court's stern remark; states that opposing the government is not a crime and expressing dissent is every citizen's right in a democracy.

मुंबई। बॉम्बे हाईकोर्ट ने नागरिकों के अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक अधिकारों को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि केवल सरकार के फैसलों का विरोध करने या सरकार के खिलाफ नारे लगाने के आधार पर किसी नागरिक को शहर या जिले से बाहर नहीं किया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि विरोध करना लोकतंत्र का अभिन्न हिस्सा है और संविधान प्रत्येक नागरिक को अपनी बात रखने का अधिकार देता है। गुरुवार को सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति माधव जामदार ने कहा कि सरकार के खिलाफ नारे लगाना या उसके निर्णयों का विरोध करना किसी व्यक्ति को ‘देश निकाला’ देने का वैध आधार नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि यदि नागरिक शांतिपूर्ण ढंग से अपनी असहमति व्यक्त करते हैं तो इसे कानून-व्यवस्था के लिए खतरा मानना उचित नहीं है। मामले की सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति माधव जामदार ने पुलिस और प्रशासन से कई सवाल पूछे। उन्होंने कहा कि यदि किसी व्यक्ति ने ‘भाजपा सरकार मुर्दाबाद’ या ‘अमित शाह मुर्दाबाद’ जैसे नारे लगाए हैं, तो केवल इसी वजह से उसे शहर से बाहर करने का आदेश कैसे दिया जा सकता है। अदालत ने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में नागरिकों को सरकार की नीतियों से असहमति जताने और विरोध करने का संवैधानिक अधिकार प्राप्त है। न्यायालय ने यह भी टिप्पणी की कि यदि विरोध प्रदर्शन या आंदोलन करना ही अपराध मान लिया जाएगा तो लोकतांत्रिक मूल्यों का क्या होगा। सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जामदार ने यह भी कहा कि ऐसा प्रतीत होता है मानो नागरिकों को सरकार का ‘गुलाम’ बनाने की कोशिश की जा रही हो। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि विभिन्न मुद्दों पर लोग अपनी आवाज उठाएंगे, तो क्या हर बार उनके खिलाफ मुकदमे दर्ज किए जाएंगे? 

दरअसल, यह मामला सोशलिस्ट डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया के महासचिव सईद अहमद से जुड़ा है। मुंबई पुलिस ने उनके खिलाफ एक वर्ष के लिए शहर से बाहर रहने का देश निकाला आदेश जारी किया था। इस आदेश को चुनौती देते हुए सईद अहमद ने बॉम्बे हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। पुलिस का कहना था कि सईद अहमद विभिन्न आंदोलनों और विरोध प्रदर्शनों में सक्रिय रहे हैं। उनके खिलाफ दर्ज मामलों के आधार पर प्रशासन ने उन्हें शहर से बाहर करने का निर्णय लिया था। सुनवाई के दौरान अदालत के समक्ष बताया गया कि सईद अहमद के खिलाफ पांच एफआईआर दर्ज हैं। इनमें अधिकांश मामले केंद्र सरकार के विभिन्न निर्णयों के खिलाफ आयोजित विरोध प्रदर्शन, धरना और रैलियों से संबंधित हैं। इन आंदोलनों में नागरिकता संशोधन कानून तथा ज्ञानवापी मस्जिद विवाद जैसे मुद्दों पर आयोजित प्रदर्शन भी शामिल थे। अदालत ने पूछा कि जब ये मामले मुख्य रूप से विरोध प्रदर्शनों से जुड़े हैं, तो इन्हें देश निकाला जैसे कठोर कदम का आधार कैसे बनाया जा सकता है।

हाईकोर्ट ने रद्द किया देश निकाला आदेश
मामले की सुनवाई के बाद बॉम्बे हाईकोर्ट ने सईद अहमद के खिलाफ जारी एक वर्ष के देश निकाला आदेश को निरस्त कर दिया। अदालत ने कहा कि केवल सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन या नारेबाजी किसी व्यक्ति को शहर से बाहर करने का पर्याप्त और वैध आधार नहीं है। न्यायालय ने यह भी दोहराया कि भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, शांतिपूर्ण विरोध और सम्मानपूर्वक जीवन जीने का अधिकार प्रदान करता है। इन अधिकारों का उपयोग करने मात्र से किसी नागरिक को दंडित नहीं किया जा सकता।


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