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सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसलाः अब गोद लेने वाली मां को भी मिलेगा 12 हफ्ते का मातृत्व अवकाश! 3 महीने की उम्र सीमा खत्म कर भेदभाव पर लगाई रोक

  • Awaaz Desk
  • March 17, 2026 09:03 AM
The Supreme Court's landmark decision: Adoptive mothers will now also receive 12 weeks of maternity leave! The three-month age limit has been abolished, eliminating discrimination.

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने आज मंगलवार को महिलाओं के हक में एक बड़ा और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मातृत्व संरक्षण एक मौलिक मानवाधिकार है, जिसे बच्चे के जन्म के तरीके के आधार पर छीना नहीं जा सकता। अदालत ने आदेश दिया है कि गोद लिए गए बच्चे की मां को भी 12 हफ्ते की मैटरनिटी लीव दी जाएगी। खास बात ये है कि गोद लिए बच्चे की उम्र जो भी हो, मां को पूरे 12 हफ्ते की छुट्टी दी जाएगी। इसी के साथ सुप्रीम कोर्ट ने उस कानूनी प्रावधान को निरस्त कर दिया है, जिसमें सिर्फ 3 महीने तक की उम्र के बच्चे को गोद लेने पर ही मैटरनिटी लीव की अनुमति थी। लेकिन अब ऐसी कोई शर्त नहीं है। मौजूदा सामाजिक सुरक्षा संहिता की धारा 60(4) में ये नियम था कि गोद लेने वाली मां को 12 हफ्ते की मैटरनिटी लीव तभी मिलेगी, जब गोद लिया गया बच्चा 3 महीने से कम उम्र का हो। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि एक बायोलॉजिकल मां की तरह ही गोद लिए गए बच्चे की मां को भी मैटरनिटी लीव मिलनी चाहिए। कोर्ट का मानना है कि मैटरनिटी का अधिकार और बच्चे की देखभाल की जरूरत उम्र पर निर्भर नहीं करती। 

3 महीने की उम्र सीमा हटाई
सुप्रीम कोर्ट ने 3 महीने की उम्र सीमा को हटाते हुए कहा कि ये भेदभाव करता है। अदालत ने माना कि बड़े बच्चे को गोद लेने वाली मां को भी बच्चे के साथ इमोशनल तालमेल बिठाने और उसकी देखभाल के लिए समय की जरूरत होती है। वहीं सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले के दौरान माओं के साथ-साथ पिताओं की भूमिका पर भी बात की। कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा है कि वो पितृत्व अवकाश पर भी एक ठोस नीति बनाने पर विचार करे। अदालत का मानना है कि बच्चे के पालन-पोषण में पिता की भागीदारी भी उतनी ही अहम है। इसीलिए इसे सामाजिक सुरक्षा लाभ के दायरे में लाना चाहिए। जस्टिस पारदीवाला और जस्टिस महादेवन की बेंच ने इस बात पर जोर दिया कि परिवार बनाने के लिए गोद लेना एक वैध रास्ता है। कोर्ट के मुताबिक गोद लिए गए बच्चे और ‘प्राकृतिक’ बच्चे के बीच कानून कोई भेदभाव नहीं कर सकता।


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