उत्तराखंड:चार मठों में से एक और आध्यात्मिक नगरी के नाम से प्रसिद्ध जोशीमठ खतरे की जद में,सामान्य मौसम में भी हो रहा भू धंसाव,घरों में आ रही दरारें
उत्तराखंड के चमोली जिले में स्थित जोशीमठ अध्यात्म की दृष्टि से एक पवित्र शहर माना जाता है जो उत्तराखंड के चमोली जिले में स्थित है। समुद्र स्तर से 6000 फीट की ऊंचाई पर स्थित यह शहर बर्फ से ढकी हिमालय पर्वतमालाओं से घिरा हुआ है। यह स्थल हिंदू धर्म के लोगों के लिए प्रतिष्ठित जगह है और यहां कई मंदिर भी स्थापित हैं। जोशीमठ, आदि शंकराचार्य द्वारा 8 वीं सदी में स्थापित किए जाने वाले चार मठों में से एक है, लेकिन आज इस पर्यटन नगरी में जगह-जगह आवासीय भवनों पर दरारें पड़ रही हैं। सामान्य मौसम में भी यहां ज़मीन धंस रही है। जोशीमठ के गांधी नगर मोहल्ले में कई भवनों में पड़ी दरारेँ प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है। नृसिंह मंदिर परिसर में कई जगह से ज़मीन धंस चुकी है लेकिन जिला प्रशासन इस ओर कोई ध्यान नही दे रहा है।
अमर उजाला से हुई बातचीत में भू-वैज्ञानिकों ने कहा कि जोशीमठ नगर पुराने रॉक स्लाइड (भूस्खलन क्षेत्र) पर बसा है। डिप स्लोप होने के कारण अलकनंदा से भू-कटाव हो रहा है, जिससे धीरे-धीरे भूमि खिसक रही है। जोशीमठ नगर क्षेत्र का भूसर्वेक्षण करने के साथ ही यहां निर्माण कार्यों को कम से कम कर पानी के ड्रेनेज के प्रबंधन पर विशेष जोर दिए जाने की आवश्यकता है। भू वैज्ञानिक डा. दिनेश सती का कहना है कि जोशीमठ नगर क्षेत्र पुराने रॉक स्लाइड पर बसा हुआ है। यहां पेट्रोल पंप, नृसिंह मंदिर और ग्रेफ कैंप के निचले हिस्से में रुके बड़े-बड़े बोल्डर इसका प्रमाण हैं। इसी भूस्खलन से गौरसों बुग्याल से लेकर अलकनंदा तक जोशीमठ का डिप स्लोप है। अलकनंदा से भू कटाव होने के कारण जोशीमठ में भूमि के अंदर हलचल पैदा हो रही है। जोशीमठ के भूगर्भीय सर्वेक्षण के बाद ट्रीटमेंट होना बेहद जरूरी है।
आपको बता दें कि समुद्र तल से करीब 1800 मीटर की ऊंचाई पर स्थित ज्योतिर्मठ (जोशीमठ) को बदरीनाथ धाम का प्रवेश द्वार कहा जाता है। यहां नृसिंह मंदिर के दर्शनों के बाद ही तीर्थयात्री अपनी बदरीनाथ धाम की तीर्थयात्रा शुरू करते हैं। ऐसा कहा जाता है कि बद्रीनाथ यात्रा तब पूरी नहीं मानी जाती, जब तक नरसिंह मंदिर के दर्शन ना किए जाएँ। नरसिंह मंदिर, भगवान विष्णु के अवतार नरसिंह को समर्पित है,इसके निर्माण के बारे में कई कहानियाँ हैं। राजतरंगिणी के अनुसार इसका निर्माण कश्मीर के राजा ललितादित्य मुक्तापीड़ ने किया। कुछ लोगों का मानना है इसकी स्थापना पांडवों ने की थी और कुछ का मानना है इसका निर्माण शंकराचार्य ने करवाया था।
तिब्बत (चीन) सीमा क्षेत्र का यह अंतिम नगर क्षेत्र है। नगर के अधिकांश क्षेत्र में सेना और आईटीबीपी के कैंप स्थित हैं। जोशीमठ से ही पर्यटन स्थल औली के लिए रोपवे और सड़क मार्ग है।सर्दियों में बद्रीनाथ की गद्दी यहीं विराजित होती है और पूजा होती है। पहले इस जगह को ज्योतिषीमठ के नाम से जाना जाता था, समय के साथ इसे जोशीमठ कहा जाने लगा।