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उत्तराखंड के जंगल धधके! पिछले 12 घँटों में 8 जगह हुई वनाग्नि की घटनाएं! आखिर क्यों लगती है जंगलों में आग? जंगलों के आसपास रहने वालों को भी रहना होगा सतर्क

editor
  • Kanchan Verma
  • April 04, 2022 05:04 AM
Uttarakhand's forests blaze! There were 8 incidents of forest fire in the last 12 hours! Those living around forests have to be alert

उफ़्फ़! पिछले 12 घण्टों में उत्तराखंड के विभिन्न जंगलो में आग लग चुकी है जो बेहद चिंताजनक है। 8 अलग अलग स्थानों में लगी आग से करीब पौने 5 हैक्टेयर वन संपदा को नुकसान पहुंचा है। 
जैसे जैसे गर्मी बढ़ रही है वैसे वैसे जंगलों में वनाग्नि की घटनाएं भी बढ़ने का खतरा बढ़ रहा है। पिछले 12 घण्टो में वनाग्नि से हज़ारो रुपये का नुकसान हो चुका है,ये वनाग्नि की घटनाएं गढ़वाल और कुमाऊं में कल हुई जिनमे गढ़वाल में 7 और कुमाऊं में एक घटना सामने आई है। ये पिछले बारह घण्टे का रिकॉर्ड था। वही अगर बात करे इस फायर सीजन की तो उत्तराखंड में अब तक वनाग्नि की कुल 167 घटनाएं सामने आ चुकी है,जिनमे 214 हैक्टेयर के करीब जंगलो को नुकसान पहुंचा है।
वन विभाग की ओर से जंगलों के आसपास रहने वाले लोगो को दिशा निर्देश दिए गए है कि जैसे ही कही भी जंगल मे कोई चिंगारी भी दिखाई दे तो तुरंत रेंज अधिकारी, डीएफओ कार्यालय या डिसास्टर कंट्रोल रूम में इसकी सूचना दें ताकि जंगलों को नुकसान होने से पहले ही बचाया जा सके।
आपको बता दें कि उत्तराखंड में फायर सीजन 15 फरवरी से 15 जून तक रहता है। जंगलों में जब सुखी पत्तियां गिर जाती है और इकठ्ठी हो जाती है तो अक्सर ग्रामीण लोग खुद उन सुखी पत्तियों में आग लगा देते है ताकि उनकी जगह नई घास उग सके। पर जब ग्रामीण आग लगाकर छोड़ देते है तो यही आग भड़क जाती है और दूर तक फैल जाती है। उत्तराखंड में चीड़ के पेड़ भारी संख्या में है और इन्हीं पेड़ो की पत्तियां जिन्हें पिरूल भी कहते है इनसे निकलने वाला रसायन रेज़िन काफी ज्वलनशील होता है,इसीलिए जब कोई ग्रामीण सुखी पत्तियों या घासफूस में आग  लगाता है तो पिरूल एकदम आग पकड़ती है औऱ आग फैला देती है। 
वन विभाग जंगलों में फ़रवरी से पहले ही कंट्रोल बर्निंग फायर लाइन तैयार तो करती है पर इसके किये क्रू स्टेशन पर नज़र रखने में कही न कही लापरवाही बरती जाती है।इसके अलावा वन विभाग द्वारा वनाग्नि को रोकने के लिए ग्रामीणों को जन जागरूकता अभियान से जोड़ना भी आवश्यक है ताकि किसी की एक भूल का खामियाजा जंगलों को न भुगतना पड़े।


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