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उत्तराखंड में जमीन विवादों पर 'पुलिसिया दखल' खत्म: अब लैंड फ्रॉड कमेटी की हरी झंडी के बिना नहीं होगी एफआईआर, त्रिवेंद्र सिंह रावत का फॉर्मूला लागू

  • Tapas Vishwas
  • April 06, 2026 02:04 PM
'Police Intervention' in Land Disputes Ends in Uttarakhand: No FIRs to be Registered Without the Green Signal from the Land Fraud Committee—Trivendra Singh Rawat's Formula Implemented.

देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति और प्रशासनिक गलियारों में लंबे समय से चर्चा का विषय बने 'जमीन विवाद और पुलिस की भूमिका' पर राज्य सरकार ने ऐतिहासिक फैसला सुना दिया है। सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि अब जमीनों के झगड़ों में पुलिस सीधे हस्तक्षेप नहीं कर पाएगी। नए निर्देशों के अनुसार, जमीन से जुड़े किसी भी फर्जीवाड़े या विवाद में तब तक एफआईआर दर्ज नहीं होगी, जब तक शासन द्वारा गठित 'लैंड फ्रॉड कमेटी' इसकी गहन जांच कर अपनी संस्तुति नहीं दे देती।

सरकार का यह कदम सीधे तौर पर पूर्व मुख्यमंत्री और हरिद्वार सांसद त्रिवेंद्र सिंह रावत की उस सलाह पर मुहर है, जिसमें उन्होंने पुलिस को सिविल विवादों से दूर रखने की वकालत की थी। पिछले कुछ वर्षों में देहरादून समेत मैदानी जिलों में जमीनों के फर्जीवाड़े, डबल रजिस्ट्री और अवैध कब्जों की बाढ़ सी आ गई थी। अक्सर देखा गया कि राजस्व और सिविल प्रकृति के मामलों में भी पुलिस सीधे कूद पड़ती थी। इससे न केवल मामले अनावश्यक रूप से आपराधिक मोड़ ले लेते थे, बल्कि पुलिस का मूल काम (कानून व्यवस्था) भी प्रभावित हो रहा था। कई बार पुलिस पर पक्षपात और भू-माफियाओं के साथ मिलीभगत के आरोप भी लगे। सरकार की इस नई व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य पुलिस की अनावश्यक दखलंदाजी रोकना और केवल वास्तविक आपराधिक मामलों में ही कार्रवाई सुनिश्चित करना है। भाजपा के वरिष्ठ नेता त्रिवेंद्र सिंह रावत ने सार्वजनिक मंचों से यह मुद्दा उठाया था कि पुलिस का कीमती समय जमीन विवादों को सुलझाने में बर्बाद होता है, जिससे राज्य की कानून व्यवस्था पर प्रतिकूल असर पड़ता है। उनका मानना था कि जमीनों का निपटारा राजस्व विभाग और लैंड फ्रॉड कमेटी जैसे प्रशासनिक तंत्र के जरिए होना चाहिए। सरकार ने अब इसी दिशा में कदम बढ़ाते हुए पुलिस के हाथ बांध दिए हैं।


इस नई व्यवस्था को अमलीजामा पहनाने के लिए गढ़वाल कमिश्नर और मुख्यमंत्री के सचिव विनय शंकर पांडे की अध्यक्षता में एक हाई-प्रोफाइल बैठक आयोजित की गई। बैठक के आंकड़े चौंकाने वाले हैं:
लंबित मामले: गढ़वाल क्षेत्र में वर्ष 2021 से अब तक करीब 200 लैंड फ्रॉड के मामले लंबित हैं।
निस्तारण: अब तक केवल 40 मामलों का समाधान हुआ है, जबकि 160 फाइलों पर धूल जम रही है।
विशेष अभियान: समिति ने अगले 15 दिनों के भीतर इन सभी लंबित मामलों की विस्तृत रिपोर्ट तलब की है।
एफआईआर के आदेश: प्रथम दृष्टया दोषी पाए गए 8 गंभीर मामलों में समिति ने तत्काल पुलिस को एफआईआर दर्ज करने के निर्देश दिए हैं।


बैठक में यह भी पाया गया कि कई मामले तहसील और उपजिलाधिकारी (एसडीएम) स्तर पर अटके हुए हैं। गढ़वाल कमिश्नर ने सख्त लहजे में निर्देश दिए हैं कि राजस्व स्तर के सभी विवादों का अधिकतम तीन महीने के भीतर निस्तारण किया जाए। इससे वर्षों से दफ्तरों के चक्कर काट रहे आम फरियादियों को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है। जहाँ एक ओर सरकार इस फैसले को पारदर्शिता का बड़ा कदम बता रही है, वहीं दूसरी ओर पीड़ितों के मन में एक डर भी है। लैंड फ्रॉड कमेटी की बैठक में पहुंचे एक पीड़ित ने बताया कि जून 2025 के बाद अब जाकर उसे सुनवाई के लिए बुलाया गया है। फरियादियों की मांग है कि यदि पुलिस का हस्तक्षेप खत्म किया गया है, तो कमेटी की बैठकें नियमित और जल्दी-जल्दी होनी चाहिए ताकि भू-माफियाओं को भागने का मौका न मिले। इस फैसले से न केवल पुलिस का बोझ कम होगा, बल्कि उत्तराखंड में निवेश और पर्यटन के लिए जमीन खरीदने वालों में सुरक्षा का भाव पैदा होगा। जब विवादों का निस्तारण प्रशासनिक कमेटी करेगी, तो फर्जी मुकदमों का डर खत्म होगा और वास्तविक अपराधियों पर शिकंजा कसना आसान हो जाएगा।


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