ग्रीनलैंड पर घमासानः बर्फ की चादर में छिपी सोने की चिड़िया! ट्रंप की नजर, पढ़ें राजा की खुराफाती मार्केटिंग और नामकरण की 1000 साल पुरानी दिलचस्प कहानी
नई दिल्ली। इन दिनों हर तरफ ग्रीनलैंड की चर्चा हो रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ग्रीनलैंड को अमेरिका में शामिल करने के बयानों के बाद दुनियाभर में हलचल देखने को मिल रही है। ट्रंप चाहते हैं कि वो ग्रीनलैंड को खरीद लें और इस क्षेत्र में अमेरिका का कब्जा हो जाए। ट्रंप की इस डील का अब ग्रीनलैंड में जमकर विरोध किया जा रहा है। हजारों लोग सड़कों पर ग्रीनलैंड बिकाऊ नहीं है के नारे लगा रहे हैं। इस बीच हर किसी के मन में एक ही सवाल उठ रहा है कि आखिर ग्रीनलैंड क्या है और इसको लेकर इतना घमासान क्यों मचा हुआ है? असल में ग्रीनलैंड में मीलों तक फैला ग्लेशियर है। वहां दूर-दूर तक बर्फ की सफेद चादर बिछी दिखती है और जमा देने वाली कड़कड़ाती सर्दी होती है। ऐसे में यह सवाल खड़ा होना लाजमी है कि जिस जमीन पर प्रकृति का हरा रंग ढूंढना बहुत मुश्किल है, उसका नाम आखिर ग्रीनलैंड क्यों रखा गया और ऐसा किसने किया? इस रहस्य के पीछे एक जबरदस्त मार्केटिंग स्ट्रैटेजी और राजा की चालाकी छिपी है। एक रिपोर्ट के मुताबिक इस कहानी की शुरुआत होती है 10वीं सदी से। आज से करीब 1 हजार पहले जब एक वाइकिंग योद्धा और नाविक Erik the Red आइसलैंड से निकाले जाने के बाद पश्चिम की ओर चले और एक नई जमीन की खोज कर डाली। समुद्र में लंबी यात्रा करने के बाद वह एक विशाल, बर्फीले द्वीप पर जा पहुंचे।
ग्रीनलैंड ही क्यों रखा गया नाम?
लेकिन अब समस्या ये थी कि Erik the Red की खोजी हुई इस जमीन पर लोगों को कैसे बसाया जाएगा? यहां तो चारों तरफ बर्फ, कड़ाके की सर्दी और सीमित संसाधन थे। इस जगह पर आकर कौन रहना चाहेगा? इस समस्या को हल करने के लिए Erik the Red ने अपना ‘खुराफाती’ दिमाग चलाया और गजब की मार्केटिंग स्ट्रैटेजी के तहत बर्फ वाली इस नई जमीन का नाम ग्रीनलैंड रख दिया। Erik the Red का मानना था कि नाम ऐसा होना चाहिए, जो लोगों को अपनी तरफ खींचे, ना कि डराए। वैसे तो यह जमीन पूरी तरह बर्फ से ढकी थी लेकिन इसके नाम 'ग्रीनलैंड' से ऐसा लगता है कि जैसे वह हरी-भरी जमीन हो।
ग्रीनलैंड ट्रंप के लिए क्यों अहम
ग्रीनलैंड आर्कटिक क्षेत्र में मौजूद दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप है। लगभग 22 लाख वर्ग किलोमीटर (8,36,330 वर्ग मील) में फैला हुआ है। एरिया के हिसाब से यह जर्मनी से करीब 6 गुना बड़ा है। यह दुनिया का सबसे कम आबादी वाला इलाका भी है। यहां लगभग 56 हजार लोग रहते हैं, जिनमें से ज्यादातर मूल निवासी इनुइट समुदाय से हैं। नॉर्थ अमेरिका और आर्कटिक के बीच स्थित होने की वजह से ग्रीनलैंड की रणनीतिक अहमियत बहुत ज्यादा है। दरअसल, इसकी लोकेशन ऐसी है कि यह डिफेंस के मामले में काफी अहम हो जाता है। अगर कहीं से मिसाइल हमला होने की आशंका होती है, तो यहां लगे सिस्टम बहुत जल्दी उसका पता लगा सकते हैं और समय रहते चेतावनी दे सकते हैं। इससे किसी भी बड़े खतरे से पहले तैयारी करने का मौका मिल जाता है। इसके अलावा आर्कटिक क्षेत्र में जो भी जहाज आते-जाते हैं, उन पर नजर रखने में भी ग्रीनलैंड की भूमिका अहम होती है। इससे यह समझने में मदद मिलती है कि इस इलाके में कौन-कौन सी गतिविधियां हो रही हैं और सुरक्षा के लिहाज से स्थिति पर लगातार निगरानी रखी जा सकती है। कोल्ड वॉर के दौरान अमेरिका ने ग्रीनलैंड पर परमाणु मिसाइलें तैनात करने की योजना बनाई थी, लेकिन तकनीकी दिक्कतों और डेनमार्क के विरोध के कारण इस योजना को छोड़ दिया गया। द्वितीय विश्व युद्ध के समय से ही अमेरिका यहां पिटुफिक स्पेस बेस संचालित कर रहा है, जिसे पहले थुले एयर बेस के नाम से जाना जाता था। फिलहाल इसका इस्तेमाल मिसाइल निगरानी के लिए किया जाता है।