सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक आदेशः देशभर के सभी स्कूलों में छात्राओं को मिलेगा फ्री सैनिटरी नैपकिन! कहा- मासिक धर्म कोई अपराध नहीं, बेटियो यह तुम्हारी गलती नहीं...
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने देशभर में स्कूली छात्राओं के लिए ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। इस दौरान सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को स्कूलों में छात्राओं को फ्री सैनिटरी नैपकिन उपलब्ध कराने के निर्देश दिये हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि मासिक स्वच्छता का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीने के और निजता के अधिकार का अभिन्न हिस्सा है। मासिक धर्म के दौरान स्वच्छता की सुविधाओं का अभाव लड़कियों के सम्मान, स्वास्थ्य और समानता को गंभीर रूप से प्रभावित करता है। इसी के साथ सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया है कि वे सभी स्कूलों में छात्राओं को निःशुल्क सैनिटरी नैपकिन उपलब्ध कराएं। कोर्ट ने कहा कि इससे न केवल स्कूल छोड़ने की दर कम होगी, बल्कि लड़कियों की शिक्षा और गरिमा की रक्षा भी सुनिश्चित होगी। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि मासिक स्वच्छता को दया या कल्याण के रूप में नहीं, बल्कि मौलिक अधिकार और सार्वजनिक स्वास्थ्य के मुद्दे के रूप में देखा जाना चाहिए। कक्षा 6 से 12 की स्कूल जाने वाली लड़कियों को मुफ्त सैनिटरी पैड उपलब्ध कराए जाने की नीति बनाने की मांग वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने ये फैसला सुनाया है। मध्य प्रदेश की सामाजिक कार्यकर्ता जया ठाकुर ने ये याचिका दायर की गई थी। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा था कि वो स्कूल में कक्षा 6 से 12 की लड़कियों को मुफ्त सैनिटरी पैड/मेन्स्ट्रूअल प्रोडक्ट उपलब्ध कराने को लेकर राष्ट्रीय नीति बनाये। कोर्ट ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से कहा है कि वो मेन्स्ट्रूअल हाइजीन को लेकर अपने फंड से चलाई जा रही पॉलिसी से केंद्र को अवगत कराएं। कोर्ट ने अपने फैसले में बेहद संवेदनशील टिप्पणी करते हुए कहा कि यह आदेश सिर्फ कानूनी तंत्र के लिए नहीं, बल्कि उन लड़कियों के लिए है जो मदद मांगने से झिझकती हैं। उन शिक्षकों के लिए, जो मदद करना चाहते हैं लेकिन सामाजिक चुप्पी से बंधे रहते हैं और उन माता-पिता के लिए, जो इस विषय पर खामोशी चुन लेते हैं। कोर्ट ने कहा, 'हम हर उस लड़की से कहना चाहते हैं जो मासिक धर्म के कारण स्कूल से अनुपस्थित रही, जिसे यह कहकर शिक्षा से दूर कर दिया गया कि उसका शरीर ‘अशुद्ध’ है, यह तुम्हारी गलती नहीं है।'
राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश
सभी राज्य और केंद्र शासित प्रदेश यह सुनिश्चित करें कि सरकारी, सरकारी सहायता प्राप्त और निजी—सभी स्कूलों में कार्यशील, जेंडर-सेग्रिगेटेड शौचालय और पानी की सुविधा उपलब्ध हो। नए स्कूलों में निजता और दिव्यांग छात्रों के अधिकारों का भी पूरा ध्यान रखा जाए। सभी स्कूलों में शौचालय परिसर के भीतर छात्राओं को निःशुल्क बायोडिग्रेडेबल सैनिटरी नैपकिन उपलब्ध कराए जाएं। प्रत्येक स्कूल में मासिक स्वच्छता प्रबंधन की व्यवस्था हो, जिसमें आपात स्थिति के लिए अतिरिक्त यूनिफॉर्म और अन्य आवश्यक सामग्री शामिल हो।
यह फैसला सिर्फ कानूनी व्यवस्था से जुड़े लोगों के लिए नहीं
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला ने कहा, 'यह फैसला सिर्फ कानूनी व्यवस्था से जुड़े लोगों के लिए नहीं है। यह उन कक्षाओं के लिए है, जहां लड़कियां मदद मांगने से हिचकती हैं। यह उन शिक्षकों के लिए है, जो मदद करना चाहते हैं लेकिन संसाधनों की कमी से बंधे होते हैं। यह उन माता-पिता और पूरे समाज के लिए है, ताकि प्रगति को इस आधार पर आंका जाए कि हम सबसे कमजोर की कैसे रक्षा करते हैं। कोर्ट ने कहा कि मासिक स्वच्छता प्रबंधन उपायों की अनुपलब्धता एक बालिका की गरिमा को ठेस पहुंचाती है, क्योंकि गरिमा का अर्थ है बिना अपमान, बहिष्कार और अनावश्यक पीड़ा के जीवन जीने की परिस्थितियां। निजता और गरिमा पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा, निजता गरिमा से अविभाज्य रूप से जुड़ी हुई है। इसलिए निजता के अधिकार का अर्थ केवल राज्य द्वारा हस्तक्षेप न करना नहीं है, बल्कि राज्य पर यह सकारात्मक दायित्व भी है कि वह किसी व्यक्ति की निजता की रक्षा के लिए आवश्यक कदम उठाए। अनुच्छेद 21, 21A और शिक्षा का अधिकार है।