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बड़ी खबरः ‘घूसखोर पंडित’ फिल्म पर सुप्रीम कोर्ट सख्त! फिल्ममेकर नीरज पांडे को फटकार, कहा- टाइटल बदलने का सुझाव बताएं तभी मिलेगी रिलीज की अनुमति

  • Awaaz Desk
  • February 12, 2026 08:02 AM
Big news: The Supreme Court cracks down on the film "Gracious Pandit"! Filmmaker Neeraj Pandey is reprimanded, told to submit a suggestion for a title change before he can be granted release permission.

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने आज गुरुवार को फिल्म ‘घूसखोर पंडित’ के फिल्ममेकर नीरज पाण्डे को फटकार लगाई। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने फिल्ममेकर नीरज पांडे की फिल्म के टाइटल को लेकर कड़ी नाराजगी जताई है। कोर्ट ने कहा कि किसी समाज के एक वर्ग को इस तरह के नाम से क्यों बदनाम किया जा रहा है? सुनवाई के वक्त सुप्रीम कोर्ट ने नीरज पांडे से पूछा कि आप किसी समाज के हिस्से को ऐसे शब्दों से क्यों नीचा दिखाना चाहते हैं? कोर्ट ने ये भी कहा कि फिल्म का टाइटल नैतिकता और सार्वजनिक व्यवस्था के खिलाफ लगता है। कोर्ट ने नीरज पांडे को निर्देश दिया है कि वे एक हलफनामा दाखिल करें, जिसमें ये साफ तौर पर बताया जाए कि फिल्म घूसखोर पंडत किसी भी समाज या वर्ग का अपमान नहीं करती है। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार, सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन और नीरज पांडे को नोटिस जारी किया है। ये नोटिस उस याचिका पर जारी किया गया है, जिसमें नेटफ्लिक्स पर फिल्म की रिलीज पर रोक लगाने की मांग की गई है। सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि जब तक आप हमें ये नहीं बताते कि फिल्म का नाम बदला गया है, तब तक हम इसे रिलीज करने की अनुमति नहीं देंगे। अब इस मामले में अगली सुनवाई के दौरान ये तय होगा कि फिल्म का नाम बदला जाएगा या नहीं और क्या फिल्म की रिलीज पर कोई रोक लगेगी। इस मामले में अगली सुनवाई 19 फरवरी को होगी। 

किसी वर्ग को बदनाम क्यों करना
फिल्म की नेटफ्लिक्स पर रिलीज रोकने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार, सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन और नीरज पांडे को नोटिस जारी किया है। सुनवाई के दौरान जस्टिस नागरत्ना ने मौखिक रूप से कहा. ये नैतिकता और सार्वजनिक व्यवस्था के खिलाफ है। जागरूक होना अलग बात हैए लेकिन देश में पहले से ही अशांति का माहौल है, ऐसे में इस तरह की अशांति पैदा करना ठीक नहीं है। उन्होंने आगे कहा कि हमें लगता था कि फिल्ममेकर, पत्रकार और अन्य लोग जिम्मेदार होते हैं और वो संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) यानी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार और उस पर लगने वाली उचित सीमाओं को समझते हैं। आप हमें बताइए कि टाइटल बदलने के लिए क्या नाम सुझा रहे हैं। कोर्ट ने ये भी साफ किया कि किसी भी समाज के वर्ग को अपमानित नहीं किया जाना चाहिए। संविधान बनाने वालों को आजादी के समय से ही देश में अलग-अलग जातियों और समुदायों की जानकारी थी। इसलिए उन्होंने बंधुत्व की अवधारणा को शामिल किया। अगर आप अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का इस्तेमाल किसी समाज को नीचा दिखाने के लिए करेंगे, तो हम इसकी अनुमति नहीं दे सकते।


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