उत्तराखंड में लाखों मतदाताओं का नहीं मिल रहा रिकॉर्ड, इन विधानसभाओं में जुड़े बेतहाशा नाम
देहरादून। उत्तराखंड में मतदाता सूची के शुद्धिकरण और अपडेटिंग की प्रक्रिया में एक बड़ी खामी सामने आई है। प्री स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (प्री-SIR) के दौरान प्रदेश के लगभग 18 लाख मतदाताओं का रिकॉर्ड 2003 की मतदाता सूची में नहीं मिल पा रहा है। इससे निर्वाचन आयोग के स्तर पर चिंता बढ़ गई है। राज्य में कुल 84 लाख 19 हजार 8 मतदाता हैं, जिनमें से केवल 65 लाख 45,657 मतदाताओं की ही बूथ लेवल अधिकारी (BLO) द्वारा मैपिंग और वेरीफिकेशन हो पाया है। शेष करीब 18 लाख 73 हजार से ज्यादा मतदाताओं का या तो पुराना रिकॉर्ड गायब है या वे मैपिंग प्रक्रिया में शामिल नहीं हो पा रहे हैं। यह स्थिति विशेष रूप से मैदानी क्षेत्रों की विधानसभा सीटों पर ज्यादा चिंताजनक है। निर्वाचन आयोग उत्तराखंड उन मतदाताओं की मैपिंग कर रहा है जिनके नाम 2003 की मतदाता सूची में दर्ज थे। प्री-SIR के दौरान BLO के माध्यम से यह काम तेजी से चल रहा है, लेकिन 2003 के रिकॉर्ड से मैच न होने वाले लाखों नाम अब सवालों के घेरे में हैं। अप्रैल से शुरू होने वाले मुख्य SIR (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) से पहले यह आंकड़ा काफी गंभीर माना जा रहा है। 31 मार्च के बाद ही स्पष्ट होगा कि कितने मतदाताओं की मैपिंग पूरी नहीं हो पाई।
सबसे खराब स्थिति इन विधानसभाओं में है:
धर्मपुर (देहरादून): 2,22,233 मतदाताओं में केवल 50% का ही 2003 का रिकॉर्ड मिला।
ऋषिकेश: 53.36%
राजपुर रोड: 54.46%
कैंट: 54.70%
मसूरी: 56.5%
रुद्रपुर: 57.55%
रायपुर: 58.57%
काशीपुर: 59.61%
इसके अलावा बाजपुर, किच्छा, डोईवाला, विकासनगर, सहसपुर और हरिद्वार विधानसभा में भी 70% से कम मतदाताओं की मैपिंग हो पाई है। जिला स्तर पर देहरादून सबसे पीछे है जहां केवल 61.22% मतदाताओं का रिकॉर्ड मिल पाया। उधम सिंह नगर में 67.14% और नैनीताल में 77.47% मतदाताओं की मैपिंग हुई है। जनगणना मंत्री मदन कौशिक ने कहा कि 10 लाख से ज्यादा लोगों की मैपिंग अभी नहीं हो पाई है। जिन मतदाताओं का रिकॉर्ड नहीं मिल रहा, उनसे 2003 की स्थिति के बारे में पूछताछ की जाएगी। मुख्य निर्वाचन अधिकारी बी.वी.आर.सी. पुरुषोत्तम ने बताया कि जिन मतदाताओं की मैपिंग नहीं हो पा रही, उनके मामले में विशेष प्रयास किए जा रहे हैं। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हरक सिंह रावत ने आरोप लगाया कि भाजपा SIR के माध्यम से मतदाताओं की संख्या में गड़बड़ी करना चाहती है। उन्होंने दावा किया कि SIR में काम करने वाले कर्मचारियों पर दबाव बनाया जा रहा है। कुछ कर्मचारियों को नाम जोड़ने या हटाने के लिए परेशान किया जा रहा है। कांग्रेस नेता अमेंद्र बिष्ट ने कहा कि देहरादून जिला सबसे ज्यादा प्रभावित है। राजधानी बनने के बाद उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों से बड़ी संख्या में लोग यहां बस गए। पर्वतीय जिलों से भी लोग देहरादून शिफ्ट हुए। इन्हीं कारणों से 2003 की सूची में इनका रिकॉर्ड नहीं मिल पा रहा है। उन्होंने कहा कि पर्वतीय क्षेत्रों में मैपिंग बेहतर हुई है, लेकिन मैदानी जिले काफी पीछे हैं।
उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले SIR का यह दौरा अत्यंत महत्वपूर्ण है। कई विधानसभा सीटों पर जीत-हार का अंतर मात्र 1000 वोटों से भी कम रहता है। ऐसे में लाखों मतदाताओं का रिकॉर्ड गायब होना या मैपिंग न हो पाना चुनावी परिणामों को काफी प्रभावित कर सकता है। निर्वाचन आयोग के अधिकारी मानते हैं कि प्रक्रिया पूरी होने के बाद जिन मतदाताओं का रिकॉर्ड सही नहीं पाया जाएगा, उनके नाम पर आगे विचार किया जाएगा। हालांकि विपक्ष इस पूरे मामले को राजनीतिक साजिश से जोड़कर देख रहा है। मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने स्पष्ट किया कि SIR का उद्देश्य मतदाता सूची को शुद्ध और सटीक बनाना है, न कि किसी को बाहर करना। फिर भी 18 लाख से ज्यादा मतदाताओं के रिकॉर्ड न मिलने का मुद्दा चुनाव आयोग के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। प्रशासनिक स्तर पर सभी BLO को अतिरिक्त जिम्मेदारी सौंपी गई है। जिन मतदाताओं का पुराना रिकॉर्ड नहीं मिल रहा, उनके दस्तावेजों की जांच और फील्ड वेरिफिकेशन तेज कर दिया गया है। अप्रैल में शुरू होने वाले मुख्य SIR में इस समस्या का समाधान निकालने का प्रयास किया जाएगा। यह स्थिति उत्तराखंड जैसे छोटे राज्य में मतदाता सूची की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा कर रही है। यदि समय रहते सही सुधार नहीं किया गया तो 2027 के चुनाव में वोटर लिस्ट को लेकर बड़े विवाद खड़े हो सकते हैं।