पूर्णिमा पर खगोलीय अद्भुत संयोगः पृथ्वी की छाया में सिमटेगा चंद्रमा! भारत में आंशिक तो जापान-ऑस्ट्रेलिया में पूर्ण चंद्र ग्रहण, एरीज नैनीताल ने किए विशेष इंतजाम
नैनीताल। आज साल 2026 का पहला चंद्र ग्रहण लग रहा है। हिंदू धर्म में चंद्र ग्रहण को केवल खगोलीय घटना ही नहीं, बल्कि धार्मिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जाता है। वैज्ञानिक रूप से जब पृथ्वी, सूर्य और चंद्रमा के बीच आ जाती है और उसकी छाया चंद्रमा पर पड़ती है, तब चंद्र ग्रहण होता है। इस दौरान चंद्रमा का रंग हल्का लाल या तांबे जैसा दिखाई दे सकता है, जिसे आम भाषा में ब्लड मून भी कहा जाता है। चंद्र ग्रहण केवल पूर्णिमा के दिन ही संभव है, क्योंकि इसी दिन सूर्य, पृथ्वी और चंद्रमा एक सीध में आ सकते हैं। हालांकि पूर्णिमा हर महीने आती है, लेकिन हर बार चंद्र ग्रहण नहीं लगता। आमतौर पर साल में दो से तीन बार चंद्र ग्रहण देखा जा सकता है।
चंद्र ग्रहण मुख्य रूप से दो प्रकार का होता है पूर्ण चंद्र ग्रहण और खंडच्छायायुक्त (आंशिक) चंद्र ग्रहण। पूर्ण चंद्र ग्रहण तब होता है जब पूरा चंद्रमा पृथ्वी की गहरी छाया में आ जाता है। वहीं खंडच्छायायुक्त ग्रहण तब होता है जब चंद्रमा का केवल एक हिस्सा पृथ्वी की छाया से प्रभावित होता है। इस बार चंद्र ग्रहण दोपहर 3ः20 बजे शुरू होगा और शाम 6ः47 बजे चंद्रमा पूरी तरह ग्रहण से मुक्त हो जाएगा। भारत के अधिकांश हिस्सों में यह आंशिक रूप में दिखाई देगा। जबकि जापान, ऑस्ट्रेलिया, फिजी, अलास्का और चीन में पूर्ण चंद्र ग्रहण देखा जा सकेगा।
नैनीताल स्थित एरीज के वैज्ञानिक डॉ. वीरेंद्र यादव के अनुसार भारत में असम, मणिपुर, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश और अंडमान-निकोबार में कुछ मिनटों के लिए पूर्ण चंद्र ग्रहण नजर आएगा, इसके बाद आंशिक ग्रहण दिखेगा। चंद्र ग्रहण के प्रभाव को लेकर कई धारणाएं प्रचलित हैं, लेकिन वैज्ञानिकों के अनुसार इसका दैनिक जीवन पर कोई विशेष असर नहीं पड़ता। चूंकि यह पूर्णिमा के दिन होता है, इसलिए समुद्र में ज्वार-भाटा आना एक सामान्य और प्राकृतिक प्रक्रिया है। एरीज, नैनीताल में आज चंद्र ग्रहण का सीधा प्रसारण किया जा रहा है और आम लोगों के लिए विशेष टेलीस्कोप की व्यवस्था भी की गई है, ताकि वे इस खगोलीय घटना को सुरक्षित और स्पष्ट रूप से देख सकें।